रामनगर, उत्तराखंड: हर साल 29 जुलाई को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है। यह दिन बाघों के संरक्षण, उनकी सुरक्षा और भविष्य की चुनौतियों पर मंथन करने का अवसर देता है। भारत में बाघ संरक्षण की कहानी काफी हद तक सफलता की मिसाल बन चुकी है, जिसमें उत्तराखंड का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व आज बाघों के लिए दुनिया के सबसे अनुकूल स्थानों में गिना जाता है। यहां लगातार बढ़ रही बाघों की संख्या प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता को दर्शाती है। हालांकि, बाघों की बढ़ती संख्या के साथ अब क्षेत्र में बढ़ता टाइगर घनत्व, मानव-वन्यजीव संघर्ष और पर्यटन प्रबंधन जैसी चुनौतियां भी सामने आने लगी हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर से बढ़ी बाघों की संख्या
देश में वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई थी। उस समय भारत में बाघों की संख्या करीब 1,411 थी। संरक्षण प्रयासों के बाद बाघों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2010 में यह संख्या 1,706, वर्ष 2014 में 2,226, वर्ष 2018 में 2,967 और वर्ष 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना में बढ़कर 3,682 तक पहुंच गई।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। वर्ष 2006 में यहां करीब 150 बाघ दर्ज किए गए थे, जो 2010 में 184 और 2014 में 215 तक पहुंच गए। वर्ष 2022 की गणना में कॉर्बेट में 260 से अधिक बाघों की मौजूदगी सामने आई, जबकि कॉर्बेट और आसपास के लैंडस्केप को मिलाकर यह संख्या 300 से अधिक मानी जाती है।
बाघों के लिए अनुकूल है कॉर्बेट का वातावरण
करीब 1,288 वर्ग किलोमीटर में फैला कॉर्बेट टाइगर रिजर्व अपने प्राकृतिक आवास, पर्याप्त जल स्रोत और समृद्ध जैव विविधता के कारण बाघों के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है। यही वजह है कि यहां बाघों का घनत्व देश के अन्य टाइगर रिजर्व की तुलना में काफी अधिक है।
बाघों से बढ़ा पर्यटन और रोजगार
कॉर्बेट में बढ़ते बाघों का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देता है। देश-विदेश से पर्यटक बाघों को देखने के लिए यहां पहुंचते हैं। इससे सफारी, होटल, रिजॉर्ट, होमस्टे, जिप्सी संचालन और नेचर गाइड जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की बड़ी उपलब्धि है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।
बढ़ता बाघ घनत्व बनी चुनौती
हालांकि, कॉर्बेट में बढ़ती बाघ संख्या अब नई चुनौतियां भी लेकर आई है। सीमित क्षेत्र में बाघों का दबाव बढ़ने से उनके प्राकृतिक आवास और संसाधनों पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के लिए नए सुरक्षित कॉरिडोर विकसित करने और अन्य वन क्षेत्रों से जोड़ने की जरूरत है, जिससे बाघों का दबाव कम हो सके और आनुवंशिक विविधता बनी रहे।
इसके अलावा मानव-वन्यजीव संघर्ष भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। जंगल की सीमाओं से बाहर बाघों की गतिविधियां बढ़ने के कारण वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी हो गया है।
पर्यटन को संतुलित रखना जरूरी
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला के अनुसार, बाघ संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन को भी संतुलित और टिकाऊ बनाना जरूरी है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण कूड़ा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि कॉर्बेट में बाघ संरक्षण के साथ स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ने पर भी लगातार काम किया जा रहा है, ताकि बाघों की बढ़ती संख्या का लाभ क्षेत्र के लोगों तक पहुंच सके।
बाघ संरक्षण सिर्फ एक प्रजाति को बचाना नहीं
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ जंगल की खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर होता है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए बाघों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे जंगल और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की मुहिम है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व आज भारत के सफल संरक्षण मॉडल का उदाहरण है, लेकिन आने वाले समय में बढ़ते बाघों के साथ संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।